1991 में सोवियत संघ के टूटने पर 15 नए देश क्यों बने?

26 दिसंबर, 1991 को सोवियत संघ (Union of Soviet Socialist Republics, USSR) विघटित होकर 15 देशों में टूट गया. संघ के टूटने के बाद बनने वाले नए देश ये थेः

  • बाल्टिक देश (Baltic states) – एस्तोनिया (Estonia), लातविया (Latvia), लिथुआनिया (Lithuania)
  • केंद्रीय एशिया (Central Asia) – कज़ाखस्तान (Kazakhstan), किर्गिज़्स्तान (Kyrgyzstan), ताजिकिस्तान (Tajikistan), तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan), उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan)
  • पूर्वी यूरोप (Eastern Europe) – बेलारूस (Belarus), माल्दोवा (Moldova), यूक्रेन (Ukraine)
  • यूरेशिया (Eurasia) – रूस (Russia)
  • ट्रांसकॉकेशिया (Transcaucasia) – आर्मेनिया (Armenia), अज़रबैजान (Azerbaijan), जॉर्जिया (Georgia)

यह जानना रोचक है कि पहले भी सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा देश था और इससे टूटने के बाद भी रूस अभी तक विश्व का सबसे बड़ा देश है.

सोवियत संघ के पतन के पीछे अनेक कारण थे. प्रमुख कारणों की लिस्ट नीचे दी गई हैः

  1. रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में सं. रा. अमेरिका का पुनरुत्थान
  2. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से उत्पन्न आर्थिक परिस्तिथियां
  3. अफ़गानिस्तान में सोवियत संघ की पराजय
  4. पूर्वी यूरोप में लोकतांत्रिक क्रांति का होना जिससे बर्लिन की दीवार गिरने पर पूर्वी और पश्चिम जर्मनी का एकीकरण हुआ
  5. मिखाइल गोर्बाचोव के युवा व प्रगतिशील नेतृत्व में सोवियत नागरिकों पर प्रतिबंध व सेंसर का शिथिल होना. इसके परिणामस्वरूप लोगों को अपने विचार प्रकट करने और विद्यमान सत्ता के विकल्प खोजने की स्वतंत्रता मिली

जब रीगन 1981 में सं. रा. अमेरिका के राष्ट्रपति बने तब USA सोवियत संघ से शीतयुद्ध में हार रहा था. 1960 और 70 के दशक में USA बहुत सारी आंतरिक राजनीतिक समस्याओं से जूझता रहाः राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी की हत्या हो गई थी, राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बदनाम होकर त्यागपत्र देना पड़ा (वॉटरगेट कांड), राष्ट्रपति जेराल्ड फ़ोर्ड बिना किसी चुनाव के ही पद आसीन रहे, राष्ट्रपति लिंडन बी जॉन्सन वियतनाम के दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध में भारी जान-माल के नुकसान और विरोध आंदोलन से परेशान रहे, और राष्ट्रपति जिमि कार्टर असहाय होकर ईरान में अमेरिकी दूतावास को बंधक बनता देखते रहे.

1950 के दशक से ही किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पद पर पूरे 8 वर्ष तक कार्य नहीं किया था. अमेरिका की असंतुष्ट बेबी बूमर्स (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पले-बढ़े लोग) जनता और मिडल-ईस्ट में तेल संकट से शासन और आर्थिक नीतियों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा था.

रीगन के नेतृत्व में अमेरिका की आर्थिक स्थिति संभलने लगी. अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व बैंक के चेयरमेन पॉल वोल्कर (Paul Volcker) द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने और तेल की कीमतों में कमी आने से मुद्रास्फ़ीति (inflation) में गिरावट आई. आर्थिक उदारीकरण से विश्व व्यापार में अमेरिका की भागीदारी तेजी से बढ़ने लगी. चीन, भारत और यूरोप के कई देश भी उन्नति की राह पर चल पड़े.

उछाल मारती अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने इसके संसाधनों में बहुत वृद्धि की और अब इसके पास राजनीतिक शक्तिसंपन्न राष्ट्रपति था जो सोवियत संघ को पूरी ताकत से चुनौती देने में सक्षम था.

रीगन ने अमेरिका में मुस्लिम लड़ाकों (मुजाहिदीन) को सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए हर संभव सहायता उपलब्ध कराई. जिस तरह से वियतनाम के युद्ध में सोवियत संघ के कारण अमेरिका की अपमानजनक विदाई हुई थी उसी तरह से सोवियत संघ को अफ़गानिस्तान से पीछे हटना पड़ा. सोवियत संघ में शिथिल हो चुकी सेंसरशिप के कारण नागरिकों ने इन खबरों से यह जान लिया कि सोवियत संघ कमज़ोर हो रहा था.

रीगन ने साम्यवाद को कुचलने के लिए उन तरीकों का भी इस्तेमाल किया जो अनैतिक माने जाते हैं. उन्होंने ईरान को हथियार बेचे और निकारागुआ में कम्युनिस्ट-विरोधी आंदोलनकारियों को आर्थिक मदद दी.

The Berlin Wall fell in 1989 Photo: REX FEATURES

पोलेंड में रीगन ने लेख वालेसा (Lech Wałęsa) के नेतृत्व में सॉलिडेरिटी (Solidarity) नामक लेबर यूनियन आंदोलन का समर्थन किया. इसने यूरोप में सरकारों को कमज़ोर किया और जर्मनी में 1989 की क्रांति के दौरान बर्लिन की दीवार टूट गई. यह दीवार पश्चिमी बर्लिन और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के बीच एक अवरोध थी जिसने 28 साल तक बर्लिन शहर को पूर्वी और पश्चिमी टुकड़ों में विभाजित करके रखा था. इसका निर्माण 1961 में शुरु हुआ था और 9 नवम्बर, 1989 के बाद के कुछ सप्ताहों में इसे तोड़ दिया गया.

तेल की कीमतों में हो रही गिरावट से सोवियत संघ को कठिनाई हो रही थी क्योंकि यह बहुत बड़ा तेल उत्पादक था.

(सीनियर) जॉर्ज बुश (George HW Bush) रीगन के उपराष्ट्रपति थे और CIA के भूतपूर्व निदेशक रह चुके थे. दोनों ने साथ काम करके यूरोप में सोवियत संघ की शक्तियों को बहुत सीमित कर दिया.


1989 की क्रांति की लहरें आगे बढ़ते-बढ़ते अपना प्रभाव दिखाती रहीं और पूर्वी यूरोप की अनेक अधिनायकवादी निरंकुश सरकारों को सत्ता छोड़नी पड़ी.

इसी के समानांतर, सोवियत नेता गोर्बाचेव अपने पहले के सोवियत नेताओं की तुलना में बहुत उदारवादी थे. वे साम्यवाद के विरुद्ध बह रही हवा का सामना कठोरता से नहीं कर सके. उनकी उदारवादी आर्थिक नीतियों और सेंसरशिप (ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका, Glasnost and Perestroika) में ढील देने से सोवियत सत्ता और भी कमज़ोर होती गई. अधिकारवादी सत्ता जब कमज़ोर पड़ने लगी तो बोरिस येल्त्सिन (Boris Yeltsin) जैसे स्थानीय क्षत्रपों का प्रभाव बढ़ता गया.

सोवियत संघ के बहुत कमज़ोर और दीवालिया हो जाने पर उसके वे राज्य उससे अलग हो गए जिनपर सोवियत संघ ने जबरन कब्जा किया हुआ था या जिनका सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप सोवियत संघ से भिन्न था.  ज्ञान ब्लॉग की इस पोस्ट में भी इसे सरल शब्दों में समझाया गया है.

क्वोरा पर बालाजी विश्वनाथन के एक उत्तर पर आधारित. featured image: Post-Soviet states (alphabetical order) 1. Armenia 2. Azerbaijan 3. Belarus 4. Estonia 5. Georgia 6. Kazakhstan 7. Kyrgyzstan 8. Latvia 9. Lithuania 10. Moldova 11. Russia 12. Tajikistan 13. Turkmenistan 14. Ukraine 15. Uzbekistan

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