पृथ्वी से मंगल तक जाने वाले अंतरिक्ष यान सीधे मार्ग से क्यों नहीं जाते?

सौरमंडल में पृथ्वी और मंगल के बीच कोई भी ग्रह नहीं है. इस प्रकार पृथ्वी से मंगल की सीधी यात्रा बहुत आसान होनी चाहिए लेकिन मामला इतना सरल नहीं है. पृथ्वी से मंगल की सीधी यात्रा नहीं हो सकने के पीछे कई कारण हैं.

पृथ्वी और मंगल (और अन्य सभी ग्रह) सूर्य की परिक्रमा अलग-अलग गति पर करते हैं. पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 30 किलोमीटर प्रति सेकंड ((1,08,000 किलोमीटर प्रति घंटा) की गति से कर रही है जबकि मंगल की गति लगभग 24 किलोमीटर प्रति सेकंड (86,871 किलोमीटर प्रति घंटा) है. जैसे-जैसे ग्रह सूर्य से दूर होते जाते हैं उनकी परिक्रमा की गति कम होती जाती है.

फिलहाल हमारी टॉप लांच वेलोसिटी (launch velocity) 16.26 किलोमीटर प्रति सेकंड है जो हमने प्लूटो और उसके आगे जानेवाले न्यू होराइजंस (New Horizons) मिशन यान को लांच करते समय प्राप्त की है. यह गति लगभग 58,536 किलोमीटर प्रति घंटा बैठती है. पृथ्वी से मंगल की न्यूनतम दूरी 5 करोड़ 46 लाख किलोमीटर है जब पृथ्वी और मंगल सूर्य के एक और होते हैं और मंगल पृथ्वी के ठीक पीछे होता है. यदि पृथ्वी और मंगल स्थिर हों तो यह दूरी एक महीने में तय की जा सकती है. जब मंगल सूर्य के दूसरी ओर चला जाता है तब पृथ्वी और मंगल के बीच की अधिकतम दूरी लगभग 40 करोड़ किलोमीटर हो जाती है.

चूंकि पृथ्वी और मंगल अलग-अलग गति से सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं इसलिए हमें जटिल गणित का सहारा लेकर यह पता करना पड़ता है कि भविष्य में किसी खास समय पर मंगल अपने परिक्रमा पथ पर कहां होगा ताकि हम उसे लक्ष्य बिंदु मानकर अपने यान का प्रक्षेपण करें.यही कारण है कि यान को लांच करने का समय बहुत सोच-विचार करके निश्चित किया जाता है.

पृथ्वी की कक्षा से मंगल तक जाने के लिए सबसे प्रभावी पथ को हॉहमेन ट्रांसफ़र ऑर्बिट (‘Hohmann Transfer Orbit’) कहते हैं. नीचे दिए चित्र में इसे सरलता से समझाया गया है क्योंकि पृथ्वी और मंगल के परिक्रमा पथ पूरी तरह से वृत्ताकार नहीं हैं. ट्रांसफ़र ऑर्बिट को बहुत शुद्धता से मापा जाना चाहिए ताकि यान इसकी ऑर्बिट एपोएप्सिस (दूरस्थ बिंदु) पर तब आए जब मंगल भी अपने परिक्रमा पथ पर उसी बिंदु पर हो. पृथ्वी और मंगल हॉहमेन ट्रांसफ़र पर हर 26 महीने में केवल एक बार ही आते हैं.

यान को स्थिर कक्षा में लांच करने के लिए पृथ्वी की सतह की स्पर्शरेखीय (tangential) ऑर्बिटल वेलॉसिटी (orbital velocity) तक त्वरण देना पड़ता है. इसलिए यान यद्यपि सीधे वर्टिकली लांच किया जाता है लेकिन वायुमंडल में बहुत ऊपर (जैसे 100 किलोमीटर) पहुंचने के बाद इसे पृथ्वी के स्पर्शरेखीय त्वरित किया जाता है ताकि यह पृथ्वी की परिक्रमा करने लगे.

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसरो (ISRO) के मंगलयान ने पहले पृथ्वी की अनेक परिक्रमाएं लगाईं ताकि इसकी गति बढ़ जाए, फिर इसने गुलेल युक्ति (slingshot maneuver) का उपयोग गिया जिसमें पृथ्वी के गुरुत्व का सहारा लेकर अपने लक्ष्य तक छलांग लगाई जाती है.


श्री गणेश सुब्रमण्यम के क्वोरा उत्तर पर आधारित. Image courtesy of Hohmann transfer orbit diagram and ISRO. (featured image)

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