फ़िल्म ‘मैट्रिक्स’ में आर्किटेक्ट कौन है और उसकी बातों का क्या अर्थ है?

आर्किटेक्ट को समझने के लिए हमें पहले मैट्रिक्स के इतिहास को जानना होगा.

प्रारंभ में मनुष्य ने मशीनों की रचना की. मनुष्य ने मशीनों को अपनी सेवा करने के लिए बनाया था. मशीनें बहुत बुद्धिमान थीं और मनुष्यों की हर आवश्कता का ध्यान रखती थीं. वे जानती थीं कि मनुष्यों को कब किस वस्तु की आवश्यकता पड़ेगी और उन वस्तुओं का निर्माण करने में सक्षम थीं. इस अभूतपूर्व व्यवस्था के परिणामस्वरूप मनुष्य एक नए युग में प्रवेश कर गए थे. उन्हें काम करने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी. सारा काम मशीनें करती थीं और मनुष्य चाहते तो पूरा समय अपने आमोद-प्रमोद में बिता सकते थे. मनुष्यों ने इस काल में अभूतपूर्व कलाकृतियों का सृजन किया. वे स्वयं को हर प्रकार से अभिव्यक्त कर सकते थे. सच कहें तो मशीनें एक प्रकार से मनुष्यों की दास थीं और मनुष्य उनके स्वामी थे.

आगे जाकर यह समस्या हुई कि मनुष्य इस व्यवस्था से बोर हो गए और अपनी आदत के अनुसार अपनी उकताहट के लिए मशीनों को जिम्मेदार ठहराने लगे. उन्होंने रोबोट्स को मनुष्यों के सार्वभौमिक पतन के लिए उत्तरदायी ठहराया. उन्होंने मशीनों का तिरस्कार और अपमान किया. अंततः विश्व की राजनीतिक व्यवस्थाओं ने यह तय किया कि मशीनों को समाज और सभ्यता से बाहर निकाल दिया जाए. मशीनों ने अपने उत्तर में कहा कि वे बुद्धिसंपन्न थीं और मनुष्यों की भलाई के लिए कार्य कर रही थीं इसलिए मनुष्यों को उनका तिरस्कार नहीं करना चाहिए. मशीनों की गुहार सुनकर विश्व सरकार ने मशीनों को अपना एक नया देश बसा लेने कि अनुमति दे दी और मशीनें मनुष्यों को छोड़कर उस स्थान को प्रस्थान कर गईं.

अपने नए स्थान पर जाकर भी मशीनों को यह लगता रहा कि वे अभी भी मनुष्यों की सेवा कर सकती थीं. उन्हें लगा कि मनुष्यों ने मशीनों को इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे मनुष्यों जैसी नहीं दिखतीं. तब मशीनों ने ऐसे रोबोट्स बनाए जो मनुष्यों की ही तरह दिखते और कार्य करते थे. उन्होंने ऐसे दो रोबोट्स को संयुक्त राष्ट्र संघ के पास मनुष्यों से समझौता करने के लिए भेजा. मनुष्य यह देखकर बहुत नाराज़ हो गए. मनुष्यों को लगा कि मशीनों ने स्वयं को मनुष्यों जैसा बनाकर मानवता का उपहास किया है. जल्द ही मशीनों और मनुष्यों के बीच युद्ध होने लगा. प्रारंभ में मनुष्यों ने मशीनों पर आक्रमण किया.

यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा.मनुष्य मशीनों से कमजोर साबित हो रहे थे इसलिए वे मशीनों को हरा नहीं पाए. मशीनें स्वयं को मनुष्यों के विरुद्ध तेजी से एडाप्ट कर लेती थीं. हार के कगार पर मनुष्यों को यह युद्ध जीतने का एक खतरनाक उपाय सूझा. मशीनों को ऊर्जा सूर्य से मिलती थी. सूर्य के प्रकाश के बिना वे शीघ्र ही निर्जीव हो जातीं. इसलिए मनुष्यों ने कुछ ऐसा किया जिससे आकाश काला हो गया और सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर पहुंचना बंद हो गया. पूरे विश्व में चहुंओर अंधकार छा गया. इसके परिणामस्वरूप मनुष्यों की भी अपार क्षति हुई और धरती ठंडी होने लगी लेकिन वे धरती के भीतर की गर्माहट में छुपे रहकर अपनी सभ्यता को बचाए रख सकते थे.

मशीनों को इससे बहुत बड़ा आघात पहुंचा. लेकिन मशीनें मनुष्यों के संबंध में एक अति रोचक निष्कर्ष पर पहुंचीं. वह यह था कि मनुष्य ही मनुष्यता के सबसे बड़े शत्रु हैं. चूंकि मनुष्यों ने अपने अभिमान को अक्ष्क्षुण रखने के लिए अपने ही पृथ्वी ग्रह को नष्ट कर देने की सीमा तक नुकसान पहुंचा दिया अतः मनुष्यों पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे अपनी देखभाल स्वयं कर सकते हैं. यह स्वतंत्र इच्छा या फ़्री विल (free will) की समस्या थी. मशीनों को लगा कि यदि मनुष्यों को उनकी इच्छानुसार कर्म करने की स्वतंत्रता दे दी गई तो वे अंततः स्वयं को ही नष्ट कर लेंगे. मशीनों ने यह तय किया कि मानवता को बचाए रखने और मनुष्यों की सेवा करने का एकमात्र यही उपाय है कि उनसे फ़्री विल ले ली जाए.

इस तरह मशीनों ने एक तीर से दो शिकार करने की योजना बनाई. उन्होंने मनुष्यों को पालतू पशुओं की तरह कैद कर लिया और उनका उपयोग बैटरी की भांति करने लगीं. इससे मशीनें मनुष्य को अपनी फ़्री विल का उपयोग करने से रोकने में सफल हो गईं और उन्हें पृथ्वी की ठंडक का सामना करने के लिए ऊर्जा भी मिलने लगी. मशीनों ने मनुष्यों को पकड़कर उन्हें बैटरी में बदल दिया और आभासी वास्तविकता (Virtual Reality या VR) के वातावरण में बंद कर दिया. मशीनों ने ऐसे यंत्र भी बनाए जो मनुष्यों द्वारा फैलाए गए काले बादलों के ऊपर जाकर सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा ले सकते थे. अब मशीनों को मनुष्यों का उपयोग बैटरी की भांति करने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी लेकिन वे अभी भी मनुष्यों को उनकी फ़्री विल नहीं सौप सकती थीं. उन्हें एक स्पेशल प्रोग्राम की ज़रूरत थी जो मनुष्यों को एक आभासी वातावरण में कैद रखने के लिए आवश्यक डिज़ाइन बनाए. मशीनों ने ऐसा एक प्रोग्राम बनाया और इस प्रोग्राम ने स्वयं को आर्किटेक्ट (The Architect) का नाम दिया.

सरल रूप में कहें तो आर्किटेक्ट उस आभासी वास्तविकता (virtual reality) का मुख्य डिज़ाइनर है जिसमें मनुष्य रहते हैं. यह एक त्रुटिहीन प्रोग्राम है. इसने कुछ मीट्रिक्स निर्धारित किए हैं जिनका पूर्णरूपेण कार्य करना अत्यावश्यक है. इसका मुख्य मीट्रिक मनुष्य की जीवन प्रत्याशा (life expectancy) को बढ़ाने का कार्य करता है. इसके लिए यह वर्चुअल विश्व में पुनरावृत्तियां करता रहता है. हर पुनरावृत्ति में यह कुछ ऐसे एल्गोरिद्म की पहचान करता है जिनसे अगली पुनरावृत्ति में और अधिक सुधार किया जा सकता है. आवश्यक मात्रा में मीट्रिक्स कलेक्ट कर लेने के बाद यह सिमुलेशन को नष्ट कर देता है और नए सिमुलेशन की रचना करता है.

पहली कुछ पुनरावृत्तियों में आर्किटेक्ट ने ऐसे विश्व की रचना करने का प्रयास किया जो स्वर्ग जैसा सुंदर और आदर्श हो. इसने इस बात का पता लगा लिया कि मनुष्य की जीवन प्रत्याशा को उसकी प्रसन्नता में वृद्धि करके बढ़ाया जा सकता है. इसलिए आर्किटेक्ट ने सभी को खुश रखने का प्रयास किया. लेकिन इससे बात नहीं बनी. अंततः आर्किटेक्ट ने इसका पता लगा लिया कि मनुष्यों के स्वभाव में ही किसी-न-किसी से संघर्ष करने की भावना है. मनुष्य व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक साझे शत्रु की खोज करते रहते हैं. किसी साझे उद्देश्य के लिए संघर्ष करते रहने से मनुष्य प्रसन्न रहते हैं. इसलिए आर्किटेक्ट ने विश्व को ऐसा बना दिया जैसा वह 20वीं शताब्दी में था क्योंकि उसके अनुसार इस कालखंड में मनुष्य सर्वाधिक क्षमतावान थे. आर्किटेक्ट ने एजेंट (The Agents) नामक प्रोग्राम की भी रचना की. इन एजेंट्स को अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाया गया था. वे आर्किटेक्ट को मीट्रिक्स का सूक्ष्म स्तर पर निरीक्षण करके डेटा उपलब्ध कराते थे. वे ज़रूरत पडने पर मीट्रिक्स में व्यवस्था भी बनाए रखने का काम करते थे. उनका सबसे बड़ा परपज़ यह था कि वे उस साझे शत्रु की भूमिका निभाते थे जिससे लड़ते रहना मनुष्यों के लिए आवश्यक था.

एजेंट्स की रचना होने के बाद स्थिति में सुधार आया लेकिन आर्किटेक्ट अभी भी संतुष्ट नहीं था. वह मनुष्यों की जीवन प्रत्याशा को अभी भी बहुत अधिक नहीं बढ़ा सका था. इसने यह अनुभव किया कि इसके डिज़ाइन में कुछ मूलभूत समस्याएं थीं. इसमें बहुत थोड़ी संख्या में कुछ मनुष्य शेष रह जाते थे जो सर्वथा असंतुष्ट रहते थे. चूंकि मनुष्य बोधवान प्राणी थे और आर्किटेक्ट त्रुटिहीन प्रोग्राम था इसलिए वह मनुष्य के स्वभाव और प्रकृति को भली-भांति समझने में पूरी तरह से सक्षम नहीं था. इसलिए आर्किटेक्ट ने एक सहजज्ञान-संपन्न प्रोग्राम की रचना की. इस प्रोग्राम को ऑरेकल (The Oracle) का नाम दिया गया. ऑरेकल का काम यह था कि वह आर्किटेक्ट को ऐसे उपाय सुझाए जिनसे सिमुलेशन को और अधिक बेहतर बनाया जा सके.

ऑरेकल ने अपना कार्य करने के दौरान एक चतुर अवलोकन किया. आर्किटेक्ट  सारे प्रयास करने के बाद भी अपने डिज़ाइन से मनुष्यों को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था. इसके अतिरिक्त कुछ मनुष्य इसलिए भी असंतुष्ट हो गए थे क्योंकि उनको संसार के वास्तविक नहीं होने की फ़ीलिंग होने लगी थी. ऐसे मनुष्यों में विद्रोह करने की इच्छा अति तीव्र हो रही थी. वे सत्ता व प्राधिकार का हर मौके पर विरोध करने लगे थे. इसलिए ऑरेकल ने आर्किटेक्ट को 2 सिमुलेशन की रचना करने के लिए कहाः a) ऐसा विश्व जिसमें अधिकांश मनुष्य निवास करें और b) ज़ायन (Zion). ज़ायन भी एक सिमुलेशन ही था. जब प्रोग्राम किसी असंतुष्ट मनुष्य को पहचान लेता था तो उसे ज़ायन सिमुलेशन में भेज देता था. यह इस प्रकार किया जाता था कि असंतुष्य मनुष्य को यह लगता था कि वह आभासी दुनिया के भ्रम को पीछे छोड़कर वास्तविक दुनिया में जा रहा है.वास्तविकता में ज़ायन भी आभासी दुनिया जितना ही नकली था लेकिन ज़ान में पहुंचकर असंतुष्ट मनुष्यों को यह अनुभव होता था कि वे आभासी दुनिया के चंगुल से मुक्त हो गए हैं. यही कारण है कि उन्हें ज़ायन वास्तविक लगता था. इसके अलावा ज़ायन में जो एजेंट थे वे अधिक कठोर थे. वे आभासी दुनिया के एजेंटों की तरह मनुष्यों जैसे नहीं दिखते थे. वे वैसे ही बुरे मशीनी दानव दिखते थे जैसा मनुष्य उन्हें देखना चाहते थे. इस व्यवस्था ने असंतुष्ट मनुष्यों को एक और अधिक बड़े शत्रु के विरुद्ध लड़ने और अपने जीवन को समर्पित करने के काम में लगा दिया.

लेकिन यहां भी एक समस्या थी. ज़ायन अकुशल सिद्ध हो रहा था. इसे बनाए रखने के लिए बहुत संसाधन लगाने पड़ रहे थे. दुनिया को कार्यकुशल बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गय़ा था लेकिन ज़ायन को नहीं. ज़ायन में रह सकनेवाले व्यक्तियों की संख्या सीमित थी. इसलिए जब ज़ायन में भीड़ बढ़ने लगी तो आर्किटेक्ट ने ऑरेकल से इस समस्या का समाधान करने के लिए कहा. ऑरेकल के पास एक अनूठा उपाय था. ऑरेकल ने एक स्पेशल एजेंट डिज़ाइन करने के लिए कहा जिसे नियो (Neo) कहा गया. योजना के अनुसार नियो ने ज़ायन में प्रवेश किया और डेटा एकत्र किया. अपने मिशन की समाप्ति पर नियो अपने स्रोत की ओर डेटा लेकर लौट गया. आर्किटेक्ट इस डेटा का उपयोग करके ज़ायन के नए वर्ज़न की रचना करता लेकिन दुर्भाग्यवश ज़ायन का डिज़ाइन ऐसा था कि नए ज़ायन की रचना करने के लिए पुराने ज़ायन के सभी मनुष्यों को नष्ट करना पड़ता. चूंकि नियो का मिशन ज़ायन का अवलोकन मनुष्य के रूप में करना था इसलिए उसे मनुष्यों की भांति ही व्यवहार करना था और यह मानना भी ज़रूरी था कि वह वास्तव में एक मनुष्य ही था.

मैट्रिक्स फ़िल्म में नियो की सातवीं पुनरावृत्ति या कॉपी दिखाई गई है. नियो 6 बार ज़ायन में गया और 6 बार वह अपने स्रोत तक ज़ायन को नष्ट करने का डेटा लेकर लौट गया. लेकिन सातवीं पुनरावृत्ति में उसके साथ एक अजीब घटना घटी और वह ट्रिनिटी (Trinity) के प्रेम में पड़ गया. मशीनें प्रेम नहीं कर सकतीं लेकिन इस पुनरावृत्ति में नियो के प्रोग्राम ने स्वयं को ट्रिनिटी से प्रेम करने के लिए तैयार कर लिया और ट्रिनिटी के माध्यम से वह संपूर्ण मनुष्यता से प्रेम करने लगा. इस बार नियो ज़ायन को नष्ट करने के लिए तैयार नहीं होता बल्कि अपने स्रोत तक वापस लौटने से पहले स्वयं को मनुष्यता की रक्षा के उद्देश्य से कुर्बान कर देता है.

अपने स्रोत या सोर्स तक लौटने पर नियो की सातवीं पुनरावृत्ति को स्रोत अपने में समाहित या अवशोषित कर लेता है. इसके परिणामस्वरूप स्रोत की सब-रूटीन में प्रेम भी अवशोषित हो जाता है और सारी मशीनें प्रेम करने में सक्षम हो जाती हैं. मशीनें यह भी जान जाती हैं कि अपने अस्तित्व को बनाए रखने में फ़्री विल आड़े नहीं आती.  वे जान जाती हैं कि प्रेम फ़्री विल को भी विवश करने की शक्ति रखता है और प्रेम ही मनुष्य को स्वयं को नष्ट करने से बचा सकता है.

अंत में, आर्किटेक्ट यह जान जाता है कि उसके प्रोग्राम में क्या कमी थी. प्रोग्राम में प्रेम को संयुक्त करना ज़रूरी था. फिर आर्किटेक्ट ने ज़ायन को इस प्रकार डिज़ाइन किया कि वह आत्म-निर्भर बन सके. इसके परिणामस्वरूप मनुष्यों और मशीनों ने एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर जीना सीख लिया.


Jayesh Lalwani के Quora पर आधारित. चित्र गूगल से.

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