अल्बर्ट आइंस्टीन को सापेक्षता के लिए नोबल पुरस्कार क्यों नहीं मिला?

नोबल पुरस्कारों से संबंधित नियमों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को किसी भी एक क्षेत्र जैसे भौतिकी, रसायन आदि में एक ही पुरस्कार दिया जा सकता है. लेकिन अल्बर्ट आइंस्टीन को सापेक्षिकता के लिए नोबल पुरस्कार नहीं मिलने के पीछे और भी कई बातें हैं.

आइंस्टीन को नोबल पुरस्कार मिलने को लेकर बहुत कुछ दांव पर लगा था. उनकी अपनी अकादमिक उपलब्धियां तथा नोबल कमेटी द्वारा उनके महत्व को रेखांकित किए जाने के अलावा उनकी भूतपूर्व पत्नी तथा दो बेटों का भविष्य भी इस पुरस्कार पर निर्भर करता था.

प्रथम विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद पराजित जर्मनी मुद्रास्फीति की चपेट में था. सरकार युद्ध से हुए नुकसान के हर्जाने की भरपाई के लिए अपनी हैसियत से ज्यादा मुद्रा छाप रही थी, जिसके परिणामस्वरूप जर्मन करेंसी मार्क धराशायी हो गई. बर्लिन में रहने के दौरान आइंस्टीन को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा.

आइंस्टीन ने अपनी पहली पत्नी मिलेवा को 1919 में तलाक दे दिया था. इसके कुछ वर्षों बाद वह अपने पुत्रों हैंस-अल्बर्ट और एडुआर्ड के साथ स्विट्ज़रलैंड चली गई. तलाकनामे की शर्तों के अनुसार आइंस्टीन ने यह स्वीकर कर लिया था कि वे भविष्य में उनको मिलनेवाले नोबल पुरस्कार में मिली राशि का उपयोग अपने बच्चों के हित में करेंगे. मंदी की मार इतनी जबरदस्त थी कि आइंस्टीन को नोबल पुरस्कार मिलने की बड़ी आस थी.

इस समय तक आइंस्टीन को पिछले 10 वर्षों से नोबल के लिए लगातार नामांकित किया जा रहा था लेकिन हर वर्ष उनकी उपलब्धियों की आलोचना बढ़ती जा रही थी. ऐसी स्थिति में नोबल कमेटी ने यह तय किया कि उन्हें सापेक्षता के सिद्धांत के लिए नोबल पुरस्कार देना ठीक नहीं रहेगा क्योंकि उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं थी. लेकिन 1919 में यह भी प्रामाणित हो गया. कैंब्रिज के खगोलशास्त्री आर्थर एडिंगटन (Arthur Eddington) ने पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान तारों की स्थिति में विचलन देखा. इस विचलन की दर वही थी जिसका आइंस्टीन अपनी 1915 की सापेक्षिकता में वर्णन कर चुके थे. अब उन्हें पुरस्कार दिया जा सकता था लेकिन कमेटी ने उन्हें फिर गच्चा दे दिया.

क्यों? क्योकि परदे के पीछे बड़े-बड़े खेल चल रहे थे.

उस काल में जर्मनी में यहूदियों के प्रति घृणा बढ़ती जा रही थी. उन्हें पहले विश्व-युद्ध में देश की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. आइंस्टीन यहूदी भी थे और युद्ध विरोधी भी थे इसलिए वे अपने विरोधियों के लिए सबसे आसान शिकार थे. सापेक्षता के सिद्धांत की जटिलता के कारण कोई उसका महत्व नहीं समझ सका था. आइंस्टीन के विरोधियों मुख्यतः अर्न्स्ट गेहर्क (Ernst Gehrcke) और फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard) ने इस सिद्धांत के कठिन गणितीय पक्ष की शुद्धता पर सवाल खड़े कर दिए.

यह स्थिति 1921 में अपने चरम पर पहुंच गई जब विवादों से तंग आकर नोबल कमेटी ने यह तय कर लिया कि सापेक्षता के लिए नोबल पुरस्कार देना ठीक नहीं रहेगा. यह विवाद एक वर्ष तक जारी रहा और फिर सुलह की स्थिति बनती दिखी.

कार्ल विल्हेल्म ओसीन (Carl Wilhelm Oseen) के सुझाव पर आइंस्टीन ने 1921 का नोबल पुरस्कार सापेक्षता के स्थान पर प्रकाश-विद्युत प्रभाव (photoelectric effect) के लिए ग्रहण करना स्वीकार कर लिया. उन्होंने इसकी खोज 1905 में की थी. इसके अनुसार जब कोई पदार्थ (धातु एवं अधातु ठोस, द्रव एवं गैसें) किसी विद्युत चुम्बकीय विकिरण (जैसे एक्स-रे, दृष्य प्रकाश आदि) से उर्जा शोषित करने के बाद इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करता है तो इसे प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते हैं. इस क्रिया में जो इलेक्ट्रान निकलते हैं उन्हें “प्रकाश-इलेक्ट्रॉन” (photoelectrons) कहते हैं. उस समय यह माना गया था कि इसकी खोज सापेक्षता से अधिक महत्वपूर्ण थी. बाद में लोगों को यह पता चला कि सापेक्षता हमारे विश्व को जानने व समझने के लिए की गई सबसे महत्वपूर्ण खोज थी और इसने हमारी भौतिकी की समझ को एकाएक बदल दिया था.

नोबल कमेटी की पुरस्कार घोषणा में यह लिखा गया था कि आइंस्टीन को यह पुरस्कार “सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान तथा विशेषकर प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए दिया जा रहा है”. माना जाता है कि “सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान” लिखकर कमेटी ने एक तरह से उनकी सापेक्षता की खोज के गौरव को स्वीकार कर लिया था. लेकिन… लेकिन कमेटी ने एक स्थान पर यह भी लिख दिया कि “यह पुरस्कार सापेक्षता और गुरुत्व संबंधी आपकी स्थापनाओं को ध्यान में रखकर नहीं दिया जा रहा है क्योंकि उनकी पुष्टि होनी बाकी है”.

बहुतों को और स्वयं आइंस्टीन को यह लगा जैसे कमेटी ने उनका तिरस्कार किया है. क्या वाकई आइंस्टीन के सिद्धांत प्रामाणिक नहीं थे? समस्या यह थी कि एडिंगटन द्वारा किए गए प्रेक्षण परिष्कृत नहीं थे और उन्होंने बहुत सारे डेटा को अनुपयोगी मानकर अपने निष्कर्षों में शामिल नहीं किया था.

कुछ लोगों को नोबल कमेटी के इस वक्तव्य के पीछे एक और रहस्य दिखता है. क्या कमेटी भविष्य में सापेक्षता की प्रामाणिकता की पुष्टि हो जाने पर आइंस्टीन को दोबारा पुरस्कृत करने के लिए आधार तैयार कर रही थी? इस पर हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते. प्रसिद्धि बढ़ने के साथ-साथ ही आइंस्टीन ने भौतिकी से संबद्ध उन लोगों से दूरी बना ली जो क्वांटम सिद्धांतों को नकार रहे थे. इस प्रकार सापेक्षता को नोबल पुरस्कार कभी नहीं मिल सका.

इस कहानी में एक रोचक मोड़ यह भी आया कि आइंस्टीन ने पुरस्कार समारोह में भाग नहीं लिया. उन्होंने आधिकारिक न्यौते मिलने के बाद भी अपने जापान के अकादमिक दौरे पर जाने को प्राथमिकता दी. उन्होंने शायद यह इसलिए किया कि उनके लिए यह पुरस्कार महत्वपूर्ण नहीं रह गया था, और शायद इसलिए भी कि उनकी जान को खतरा था.

जर्मनी के विदेश मंत्री वाल्थर राथेनो (Walther Rathenau) की यहूदी विरोधियों ने हत्या कर दी थी और जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि आइंस्टीन का नाम भी आगामी टारगेट्स की लिस्ट में था. हो सकता है कि अपनी सुरक्षा के लिए आइंस्टीन ने यूरोप के खतरनाक वातावरण से दूर सुदूर पूर्व में कुछ महीने बिताना श्रेयस्कर समझा हो.

अंत में, इस पुरस्कार से आइंस्टीन को मिलनेवाली प्रतिष्ठा के साथ मिली पुरस्कार राशि का महत्व उनके लिए सर्वाधिक था. यह राशि उनकी तलाकशुदा पत्नी और दो बेटों के बहुत काम आई क्योंकि एडुआर्ड को कम उम्र में ही शिज़ोफ़्रेनिया (schizophrenia) हो गया और उसे अस्पताल में ही रहना पड़ा.


मेरी क्यूरी (Marie Curie) को भौतिकी के लिए 1903 में और रसायन के लिए 1911 में दो नोबल पुरस्कार मिले. लीनस पॉलिंग (Linus Pauling) को रसायन के लिए 1954 में और शांति के लिए 1962 में दो नोबल पुरस्कार मिले. जॉन बार्डीन (John Bardeen) को भौतिकी में दो पुरस्कार मिले जिनमें से पहला ट्रांज़िस्टर (transistor) के लिए और दूसरा सहयोगी के रूप में सुपरकंडक्टीविटी (superconductivity) के लिए मिला. फ़्रेडरिक सेंगर (Frederick Sanger) को भी इसी तरह रसायनशास्त्र में दो नोबल पुरस्कार मिले.

आप भी यदि दूसरा नोबल पुरस्कार जीतना चाहते हों तो या तो अपना क्षेत्र बदल लें या किसी के साथ सहयोगी के रूप में काम करके पुरस्कार लें. (image credit)

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